73 साल पुरानी विरासत फिर जीवंत | पण्डो जनजाति में उमड़ा गर्व**
विशेष रिपोर्ट | अंबिकापुर
जनजातीय गौरव दिवस के राज्य स्तरीय कार्यक्रम में गुरुवार का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु और पण्डो जनजाति के वरिष्ठ सदस्य बसन्त पण्डो के बीच हुई आत्मीय मुलाकात ने पूरे सभामंडप को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम स्थल पर जब वृद्ध बसन्त पण्डो राष्ट्रपति मंच के पास पहुँचे, तो राष्ट्रपति मुर्मु ने स्वयं आगे बढ़कर उनका अभिवादन किया, उन्हें पास बुलाया और स्नेहपूर्वक शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
लोगों की तालियों के बीच राष्ट्रपति ने कहा—
“बसन्त, आप मेरे भी पुत्र हैं।”
इस एक वाक्य ने पण्डो समाज ही नहीं, पूरे जनजातीय समुदाय को गौरव की अनुभूति कराई। बसन्त पण्डो की आँखों में भावुकता साफ झलक रही थी।
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73 साल पुरानी ऐतिहासिक स्मृति फिर ताज़ा
बसन्त पण्डो का राष्ट्रपति से संबंध कोई नया नहीं, बल्कि 1952 की एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जब अंबिकापुर आए थे, तब पण्डो जनजाति का 8 वर्षीय बालक गोलू (यही बच्चा आगे चलकर बसन्त पण्डो बना) कार्यक्रम में मौजूद था।
डॉ. प्रसाद उसकी मासूमियत से इतने प्रभावित हुए कि
• उन्होंने गोलू को गोद में उठाया,
• उसका नाम बदलकर “बसन्त” रखा,
• और उसे प्रतीकात्मक रूप से अपना दत्तक पुत्र घोषित किया।
यही कारण है कि पण्डो जनजाति को आज भी “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र”कहे जाने का गौरव प्राप्त है।
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राष्ट्रपति–बसन्त मुलाकात ने पण्डो समाज में जगाया नया उत्साह
अंबिकापुर के कार्यक्रम में बसन्त पण्डो की मौजूदगी और राष्ट्रपति मुर्मु के स्नेहपूर्ण शब्दों ने पण्डो समाज में नई उम्मीद जगाई है।
जनजातीय प्रतिनिधियों ने कहा—
• यह सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि पण्डो समाज की पहचान का पुनर्स्थापन है।
• राष्ट्रपति द्वारा “पुत्र” कहना पूरे समुदाय के लिए गर्व का संदेश है।
• इससे पण्डो समाज की समस्याएँ अब राष्ट्रीय स्तर पर अधिक मजबूती से सुनी जाएँगी।
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बसन्त पण्डो ने राष्ट्रपति के समक्ष 5 प्रमुख मांगें रखीं
लगभग 80 वर्ष के बसन्त पण्डो ने इस अवसर पर पण्डो समाज के हित में पाँच बिंदुओं पर लिखित मांगें राष्ट्रपति को सौंपीं—
1. पण्डो जनजाति को केंद्र की जनजाति सूची (Central ST List) में शामिल किया जाए,
ताकि केंद्र सरकार की सभी योजनाओं का लाभ मिल सके।
2. पण्डो जनजाति को आवंटित भूमि के पट्टों का जल्द से जल्द वितरण।
3. पण्डो समाज के शिक्षित बेरोजगार युवाओं को सरकारी रोजगार का लाभ।
4. छत्तीसगढ़ के सभी जिलों में जहाँ पण्डो समाज निवासरत है, वहाँ आवासीय शिक्षा व्यवस्था (Hostel/Residential Schools) विकसित की जाए।
5. पण्डो जनजाति बहुल क्षेत्रों में अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
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भावुक दृश्य बना इतिहास का हिस्सा
जैसे ही राष्ट्रपति मुर्मु ने बसन्त पण्डो को पुत्र संबोधित किया, पूरा सभामंडप तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
मंच पर मौजूद जनजातीय नेता, सामाजिक प्रतिनिधि और अधिकारी इस क्षण को “ऐतिहासिक” बताते हुए भावुक नजर आए।
यह दृश्य अंबिकापुर ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ के जनजातीय समुदाय के लिए
गौरव, सम्मान और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गया।


